💐 { मेरे हक में लोगों दुआ करो }💐
कहीं मंदिरों मे दिया नहीं __ कहीं मस्जिदों मे दुआ नहीं!
मेरे शहर मे हैं ख़ुदा बहुत __ मगर आदमी का पता नहीं!!
कहीं यूं न हो __ तेरे हाथ मे __ मै हवा से मिल के भड़क उठूँ!
अभी खेल मत __ मेरी राख़ से____मै सुलग रहा हूँ बुझा नहीं!!
न मै भीड़ हूँ ___ न मै शोर हूँ __ मै इसीलिए कोई और हूँ!
कई रंग आए गए मगर ___ कोई रंग ,__ मुझपे चढ़ा नहीं!!
मेरी ताज़गी से डरे हुए ___ है कई पुराने गुलाब भी!
मेरे हक़ मे लोगो दुआ करो___अभी ठीक से मै खिला नहींं!!
ये जो बोतलों मे शराब है__ ये ख़राब थी__ये ख़राब है!
इसे छोड़ दे, इसे तोड़ दे__ये किसी मरज़ की दवा नहीं!!
मुझे शेर कहना था __ कह दिया__ मुझे शेर पढ़ना था पढ़ दिया!
मुझे शोहरतों की हवस नहीं__ मुझे तालियों का नशा नही!!
शकील आज़मी जी की नज़्म
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यौम-ए-पैदाइश: परवीन शाकिर
लम्हात ए वस्ल__ कैसे हिजाबों में कट गए
वो हाथ बढ़ न पाए _कि घूंघट सिमट गए
ख़ुशबू तो साँस लेने को__ ठहरी थी राह में
हम बदगुमान ऐसे__ कि घर को पलट गए
मिलना_दोबारा मिलने का वादा_जुदाईयाँ
इतने बहुत से काम __अचानक निमट गए
रोई हूँ आज खुल के बड़ी मुद्दतों के बाद
बादल जो आसमान पे छाए थे छट गए
किस ध्यान से पुरानी किताबें खुली थीं कल
आई हवा तो कितने वरक़ ही उलट गए
शहर ए वफ़ा में धूप का साथी कोई नहीं
सूरज सरों पे आया तो साए भी घट गए
इतनी जासरतें तो उसी को नसीब थीं
झोंके हवा के कैसे गले से लिपट गए