कथित तौर पर, सुल्तान ने अपने सिर से एक सेल की सलाखों को मारकर या जहर खाकर सुसाइड कर लिया था। इस वर्ज़न को तुर्क इतिहासकारों द्वारा प्रचारित किया गया था। एक वर्ज़न यह भी था कि तैमूर के हुक्म पर बायज़िद को जहर दिया गया था। इसे नामुमकिन माना जाता है, क्योंकि इस बात का सुबूत मौजूद है की उस्मानी हुक्मरानों ने बायज़िद की देखभाल अपने निजी डॉक्टरों को सौंपी थी।
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समकालीनों और वाकेआत के गवाहों की तफ़सील में, न तो किसी सेल और न ही अपमान का जिक्र किया गया है।
कैद के दौरान सुल्तान के साथ जो कुछ भी हुआ उसे वो ज्यादा दिन तक नहीं सह सके अगले कुछ महीनों के अंदर ही दौराने कैद ही उनकी मौत हो गयी थी।
सुलतान बायजीद की पैदाइश 29 जून 1354 ई. में हुयी थी। आगे चल कर ये अपने वालिद मुराद I की कोसोवो की जंग में वफ़ात के बाद तख़्त पर बैठे थे। कोसोवा की जंग तो उस्मानियों ने जीत ली थी। लेकिन अब उनके सामने दूसरा बड़ा दुश्मन कोई यूरोपीय ताकत नहीं बल्कि मध्य एशियाई विजेता (Conqueror of Central Asia) अमीर तैमूर था।
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दरअसल उस समय तैमूर लंग की बढ़ती सरहदें उस्मानी सरहदों को छूने लगीं थीं। दोनों ही अपने दौर के ताकतवर हुक्मरान थे। एक ने एशिया तो दूसरे ने यूरोप में अपनी धाक जमा रखी थी। अमीर तैमूर को सल्तनते उस्मानिया पर हमला करने के लिए कोई ठोस बहाना चाहिए था। सो उसने एक तरकीब निकाल ली अमीर तैमूर अपने आप को चंगेज खान का वंशज मानता था। तो उसके हिसाब से अनातोलिया के कुछ समय पहले तक मंगोलों के कब्जे वाले इलाकों पर उसका अधिकार था। जिसे उस्मानियों ने स्थानीय हुक्मरानों से लड़ कर जीत लिया था।
20 जुलाई 1402 को जब अंकरा में उस्मानी और तैमूरी फौज आपस में टकराई तो उस जंग में सुल्तान बायजीद की शिकस्त हो गयी। अमीर तैमूर ने सुल्तान बायजीद को कैदी बना लिया था। उसके 1 बरस बाद ही अमीर तैमूर की कैद में ही सुल्तान बायजीद का इंतकाल हो गया था।
सुल्तान बायजीद की मौत पर भी अलग-अलग वर्ज़न मौजूद हैं। उनमे से एक ने बायजीद के सुसाइड करने का भी जिक्र किया है।
"गिद्ध (Vulture) एक मुर्दार गोश्त खाने वाला परिंदा है, खाते हुए पेट तो भर जाता है लेकिन भूख ख़तम नहीं होती तो वह भागना शुरू कर देता है, और भागते भागते हुए ख़ाया हुआ उलट देता है, उलटी के बाद फ़िर खाने लग जाता है, फ़िर भी पेट तो भर जाता है, लेकिन भूख़ ख़तम नहीं होती, इसी तरह वह बार- बार यही अमल दोहराता लेकिन भूख़ ख़तम नहीं होती, क्योंकि वह हराम और मुर्दार खाता है.
*ये क़ुदरत के वज़आ करदह (Formulated) उसूल हैं, जो हराम खाने वालों के लिए लम्हा-ए-फ़िक्रया हैं, वह कुछ लोगों को अख्तियार दे कर भरपूर मौका देती हैं, कि जितना ख़ा सकते हो, ख़ा लो, मगर सीरी (सिकम सेर होकर खाना satisfied) की लज़्ज़त से हमेशा महरूम रहोगे, माल-ए-हराम खाना तुम्हारे लिए एक मशक़्क़त के सिवा कुछ नहीं, है, हराम खाने से पेट तो भर जाएगा, लेकिन तुम्हारी भूख कभी ख़तम नहीं होगी