12वीं सदी मजहबी झगड़ों, सियासी उठा-पटक और इक़्तेदार की अनंत लड़ाईयों से भरी हुयी थी, बैतुलमुकद्दस पर ईसाईयों का कब्ज़ा था और ईसाई सलीब के साये में इकट्ठा हो कर अपने हारे हुए इलाके पर दोबारा कब्ज़ा करने की जद्दोजेहद में लगे हुए थे। 1163 का साल था जब बादशाहे यरूशलेम अमालरिक I ने मिस्र पर हमले की कयादत की जब बादशाह का कुंबा मिस्र में में मौजूद था तो मशरिक़ की सलीबी रियासतों की सरहदें कमजोर पड़ गयीं।
With Zikr E Mewat , Bilal Ahmed
पैगंबर मुहम्मद ﷺ की वफ़ात के ठीक बाद हजरत अबू बकर सिद्दीक (रजि.) खलीफा बने। जब उन्होंने इक़्तेदार संभाला, तो मुख्तलिफ क़बाएल ने उम्मत से अलग होने की कोशिश की और खिलाफत के खिलाफ बगावत कर दी। ये बगावत पूरी तरह से राजनीतिक और आर्थिक थी।
हजरत अबू बक्र (रजि.) ने अपनी हिकमत और नरमी से इस बगावत को दबा दिया और अरबों के इत्तेहाद को मुकम्मल किया।
उनकी हुकूमत में शाम (सीरिया) और फारस में भी मुहिम चलायी गयी। उनकी वफ़ात के बाद ये मुहिमात उनके जानशीनों ने अंजाम दीं। खास तौर पर हज़रत उमर बिन अल-खत्ताब (रजि.) ने। जिनके दौरे खिलाफत में इस्लामी फौजों ने ताकतवर सासानियों और बीजान्टिनयों को शिकस्त दी थी और बैतुलमुकद्दस को भी आज़ाद करा लिया था।
हजरत अबू बकर (रजि.) की हुक्मरानी न सिर्फ इस वजह से अहम् थी की उन्होंने बागियों पर फतह हासिल की बल्कि शाम (सीरिया) और फारस की मुसलमानों की फतेह के आगाज के लिए भी। जिसने इस दुनिया के नक़्शे को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था।
यहां तक की अमीर-उल-मोमिनीन के तौर पर हजरत अबू बक्र (रजि.) ने बहुत सादी और पाकीजा ज़िन्दगी गुजारी उन्हें एक हिकमत, रवादारी, अच्छे एख़लाक़ और परहेजगारी के तौर पर बयान किया जाता है। उनकी वफ़ात पूरी उम्मते मुसलमां के लिए एक दिल दहला देने वाली घटना थी। With Zikr E Mewat , Bilal Ahmed
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